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स्वच्छ भारत मिशन

पिछले कुछ वर्षों से भारत निरंतर आर्थिक विकास के पथ पर अग्रसर है, लेकिन इसके बावजूद अस्वच्छता एवं सफाई की कमी ऐसे दो कारण हैं जिनकी वजह से इसे भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। हाल ही विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में भी यह तथ्य प्रकाश में आया है कि भारत को प्रति वर्ष घरेलू उत्पाद में 6.4% प्रति वर्ष का नुकसान इन दो वजहों से झेलना पड़ता है। हालांकि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) की शुरूआत की है जिसके अंतर्गत, भारत सरकार ने वर्ष 2019 तक 'संपूर्ण स्वच्छता प्राप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस मिशन का लक्ष्य है कि वर्ष 2019 के अंत में महात्मा गांधी की 150वीं जयंती तक भारत के हर घर में एक शौचालय होगा।

स्वच्छ भारत मिशन का उद्देश्य

स्वच्छ भारत मिशन के उद्देश्य हैं – खुले में शौच के उन्मूलन, अस्वच्छ शौचालयों का फ्लश शौचालयों में रूपांतरण, मानव द्वारा मैला ढोने के कार्य का उन्मूलन, मैले के 10% का संग्रह और उसका वैज्ञानिक प्रसंस्करण/निपटान के बाद पुन: उपयोग/नगरपालिका द्वारा ठोस अपशिष्टों का पुनर्चक्रण और साथ ही लोगों को इस विषय में जागरूक करना और उनके व्यवहार मे परिवर्तन लाना ताकि स्वच्छता से संबंधित स्वस्थ परंपराओं का विकास हो सके। इस मिशन का उद्देश्य सफाई से संबंधित शहरी एवं स्थानीय निकायों को मजबूत करना है और साथ ही इस मिशन के संचालन में निजी क्षेत्रों की भी भागिदारी सुनिश्चित करना।

खुले में शौच से नुकसान

खुले में शौच देश में साफ-सफाई का अभाव होने के प्रमुख कारणों में से एक है। यह एक ऐसी प्रथा है जिसकी वजह से लोग शौच करने कि लिए शौचालय के बजाए खेतों या अन्य खुले स्थानों का तलाश करते हैं और भारत में यह प्रथा बड़े पैमाने पर फैली हुई है। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के अनुसार खुले में शौच करने की इस प्रथा की वजह से भारत, जहां खुले में शौच करने वाले लोगों की आबादी दुनिया में सबसे ज्यादा है, हर दिन करीब 65,000 टन मलमूत्र वातावरण में सम्मिलत हो जाता है।

खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ)

खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) बनना हमारे देश के लिए अभी एक कठिन लक्ष्य है क्योंकि यह एक तरह से सदियों पुरानी प्रथा है और इस वजह से लोगों के बीच जागरूकता फैलाना भी जरूरी है। उन्हें यह समझाना वाकई एक बड़ी चुनौती है कि खुले में शौच करना स्वास्थ्य के लिए बेहद नुकसानदायक है। यही वजह है कि अब तक सिर्फ तीन राज्यों — सिक्किम, हिमाचल प्रदेश और केरल को ही खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) राज्य का दर्जा मिल पाया है। सिक्किम स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत घोषित हुआ पहला ओडीएफ राज्य है।

अक्टूबर 2016 में, हिमाचल प्रदेश को भी एसबीएम के तहत खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) राज्य घोषित कर दिया गया। सिक्किम के बाद, हिमाचल प्रदेश में भी हर व्यक्ति के घर में शौचालय होने का लक्ष्य पूरा हो जाने की वजह से इस राज्य के सभी 12 जिलों को ओडीएफ का दर्जा मिला। इस दर्जे की वजह से हिमाचल प्रदेश में स्वच्छता अभियान को गति देने के लिए और परियोजनाओं को चलाने के लिए विश्व बैंक द्वारा 9,000 करोड़ रूपए की राशी मिलेगी। नवंबर 2016 में, केरल को भी ओडीएफ राज्य का दर्जा मिल गया और आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 31 मार्च 2017 तक हरियाणा, गुजरात, उत्तराखंड और पंजाब जैसे राज्यों को भी ओडीएफ का दर्जा मिल जाने की संभावना है। इन्हीं आंकड़ों के अनुसार भारत में कुल 113,000 गांव ओडीएफ
बन चुके है।

स्वच्छ भारत मिशन के लिए अनुदान

यह मिशन केन्द्र द्वारा प्रायोजित एक प्रमुख योजना है जिसके लिए सभी राज्यों का सहयोग मिलना काफी महत्वपूर्ण है। एसबीएम के लिए बजटीय आवंटन, स्वच्छ भारत कोष और निगमित सामाजिक दायित्व (सीएसआर) द्वारा धन जुटाया जाता है।

इसे भी विश्व बैंक जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन द्वारा वित्तीय सहायता मिलती है। भारत सरकार ने 2015 में स्वच्छ भारत उपकर (एसबीसी) लगाना शुरू किया है जिसके द्वारा भी इस योजना के लिए धन जुटाया जा रहा है और इस इस अभियान को बढ़ावा दिया जा रहा है।

यह उपकर सभी कर योग्य सेवाओं पर लागू है। इस कर को एकत्र करके भारत सरकार को दे दिया जाता है। स्वच्छ भारत उपकर की शुरूआत स्वच्छ भारत अभियान को बढ़ावा देने के लिए ही किया गया है। यह सभी कर योग्य सेवाओं पर 0.5% की दर से, 15 नवंबर, 2015 से प्रभावी है। एसबीसी को भारत की संचित निधि में एकत्र किया जाता है।

केंद्र सरकार ने पहले ही 2014 में स्वच्छ भारत कोष (SBK) की घोषणा कर दी थी। इसका गठन सचिव, व्यय विभाग, और वित्त मंत्रालय की अध्यक्षता में हुआ है। कई मंत्रालयों के सचिव इसका हिस्सा हैं। इसके अनुदेशों के अनुसार कॉरपोरेट सेक्टर, परोपकारी लोगों एवं कॉरपोरेट सेक्टर के नियमित सामाजिक दायित्व (सीएसआर) राशियों से इस अभियान के लिए धन जुटाया जा सकता है। साथ ही इस कोष के लिए कोई भी व्यक्ति अलग से भी अनुदान कर सकता है। इस कोष में जमा धन को ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में साफ-सफाई के स्तर में सुधार लाने के उद्देश्य से चलाए जा रहे कार्यक्रमों के लिए प्रयोग किया जाता है।

निष्कर्ष: हालांकि, इस संदेश के प्रचार-प्रसार में कि गयी 'साफ-सफाई भी पूजा के बराबर ही है, लोगों का तांता लगना शुरू हो चुका है, लेकिन अभी भी इस दिशा में पूर्ण उद्देश्य की प्राप्ति के लिए एक लंबा रास्ता तय किया जाना बाकी है। अभी भी सरकार द्वारा इस मिशन के लिए पानी की आपूर्ति, कचरे के सुरक्षित निपटान और उपचार एवं उचित इन्फ्रास्ट्रक्चर (बुनियादी ढ़ांचे) के निर्माण एवं रखरखाव सहित स्वच्छता के लिए आवश्यक कार्यों की एक पूरी श्रृंखला पर काम किए जाने की जरूरत है। केवल शौचालयों का निर्माण ही पर्याप्त नहीं है बल्कि इसके साथ-साथ उसके इस्तेमाल के प्रति लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए भी जागरूकता अभियान के चलाए जाने की आवश्यकता है। केवल यही नहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में चली आ रही सदियों पुरानी खुले में शौच करने की प्रथाओं का अंत करने के लिए पूरे समुदाय को एक साथ मिलकर प्रयास करने की आवश्यकता है। गांव-गांव में देश
के हरेक नागरीक को प्रतिज्ञा लेनी होगी कि वह भारत को स्वच्छ बनाने के लिए सही अर्थों में अपना योगदान देगा।