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किसान आत्महत्या

त्याग, तपस्या एवं कठिन परिश्रम का दूसरा नाम किसान है। हमारा देश एक कृषि प्रधान देश है जहां लगभग सत्तर प्रतिशत जनसंख्या आज भी खेती पर निर्भर है। यही वजह है कि हमारे देश में जहां भी देखो गांव ही गांव एवं दूर-दूर तक फैले हुए खेत नजर आते हैं। तपती धूप हो या कड़ाके की सर्दी पड़ रही हो किसान आपको खेतों में काम करते हुए दिख जाएंगे। किसानों की पूरी जिंदगी मिट्टी से सोना उपजाने की कोशिश में निकल जाती है। किसानों का मुख्य व्यवसाय कृषि अर्थात खेती होती है और मेहनती किसान बिना किसी शिकायत के अपने खेतों में मेहनत करता रहता है। खेतों में फसल उपजाना कोई आसान काम नहीं और फसल की बुआई, फसल की देखभाल, उसकी कटाई और फिर तैयार फसल को बाजार में बेचने जैसी तमाम कोशिशें किसानों को लगातार करते रहना पड़ता है।

चिंताजनक स्थिति

इतनी कड़ी मेहनत करने के बाद भी देश के कुछ हिस्सों के किसान आत्महत्या करने पर मजबूर है और यह एक गंभीर चिंता का विषय है। भारत को एक जमाने में सोने की चिड़िया कहा जाता था क्योंकि यहां अन्न और धन की कोई कमी नहीं थी और किसान सुखी थे। भारत को कृषिप्रधान देश का दर्जा भी इसी वजह से मिला लेकिन आज हालात काफी बदल गए हैं। आज हमारे अन्नदाता किसान के हालात इतने खराब हो गए हैं कि वे आत्महत्या करने को विवश हो जाते हैं। निश्चित रूप से यह एक भयानक त्रासदी है और एक ऐसी सच्चाई है जिससे हम मुंह नहीं मोड़ सकते।

शुरूआत कैसे हुई

भारत में किसानों की आत्महत्या की समस्या लगभग 1990 के बाद प्रबल रूप से प्रकाश में आई जब उदारीकरण का दौर शुरू हुआ था। अंग्रेजी भाषा के ‘द हिंदू’ नामक अखबार मे किसान आत्महत्या की सूचना देती हुई खबरें इसी वर्ष प्रकाशित हुई और सबसे पहले ये खबरें महाराष्ट्र से आईं। महाराष्ट्र के विदर्भ में कपास का उत्पादन करने वाले किसानों ने आत्महत्या कर ली थी और फिर आंध्रप्रदेश से भी किसानों की आत्महत्या करने की खबरें मिलने लगीं। शुरू-शुरू में लोगों ने यह सोचा कि यह समस्या सिर्फ विदर्भ एवं उसके आस-पास के क्षेत्रों की ही है और उस वजह से वहां के स्थानीय सरकार को ही इस बारे में ध्यान देने की जरूरत है लेकिन जब आंकड़ों को ध्यान से देखा गया तो स्थिति और भी भयानक नजर आई।

यह पता चला कि आत्महत्या तो पूरे महाराष्ट्र में कई जगहों के किसान कर रहे हैं और साथ ही आंध्रप्रदेश एवं देश के कई अन्य राज्यों में भी यही हालात थे। यहां सबसे ज्यादा ध्यान देने वाली बात यह है कि आत्महत्या करने वाले केवल छोटी जाति वाले किसान ही नहीं थे, मध्यम और बड़े जाति वाले किसान भी इस गतिविधि में शामिल थे। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2009 में कुल 17,368 किसानों ने आत्महत्याएं की और वर्तमान में प्रतिवर्ष 10,000 किसानों द्वारा आत्महत्या का औसत दर्ज किया जा रहा है।

समाधान जरूरी

भारत में ज्यादातर किसान गरीब हैं और उनके पास अपनी जमीनें नहीं है। वे जमींदारों की जमीन पर खेती करते हैं और उन्हीं से कर्ज लेकर बीज, खाद एवं खेती से संबंधित अन्य जरूरतों की पूर्ति करते हैं। उनके एक कर्ज का बोझ उतर भी नहीं पाता कि दूसरी फसल लगाने के लिए उन्हें फिर से कर्ज लेना पड़ जाता है और इस बीच में अगर किन्हीं कारणों जैसे कि बाढ़, सूखा, फसल में कीड़ा लग जाना इत्यादी से फसल खराब हो जाए तो वे कर्ज नहीं चुका पाते और इस वजह से वे आत्महत्या कर लेते हैं।

दूसरे शब्दों में कहा जाए तो भारत के किसान जमींदारों एवं साहूकारों के आर्थिक शोषण से परेशान होकर ही आत्महत्या करते हैं। कई बार तो यह भी देखा गया है कि फसल की जरूरत से ज्यादा पैदावार हो जाने की वजह से भी उन्हें आत्महत्या करनी पड़ जाती है क्योंकि ज्यादा पैदावार होने पर फसल का बाजार में न्यूनतम समर्थन मूल्य इतना गिर जाता है कि वह उनके कुल लागत से भी बेहद कम हो जाती है और वे अपना कर्ज नहीं उतार पाते। ऋणग्रस्तता या कर्ज में दबे होने की स्थिति ही गरीब किसानों को और भी गरीब बनाती है।

किसानों की आत्महत्या रोकने का कार्य सरकार कई किसान कल्याण एवं कृषि विकास की योजनाओं द्वारा कर सकती है। साथ ही सरकार को फसल बीमा एवं कई अन्य प्रकार की सहायता जैसे सहकारी बैंको से कम ब्याज दर पर ऋण की उपलब्धता कराना एवं उच्च गुणवत्ता वाले बीज, उच्च स्तर के खाद, उत्तम कृषि यंत्र प्रदान करना एवं भूमिहीन किसानों को भूमि उपलब्ध कराना आदि उपायों के द्वारा सरकार किसानों की आत्महत्या को रोकने में कामयाब हो सकती है।

निष्कर्ष: किसानों की आत्महत्या एक राष्ट्रीय समस्या का रूप ले चुकी है और अगर जल्द ही किसानों की स्थिति बेहतर बनाने और उन्हें आत्महत्या करने से रोका न गया तो यह स्थिति और भी भयावह रूप धारण कर सकती है। उनके लिए फसल बीमा, फसलों का उच्च समर्थन मूल्य एवं आसान ऋण की उपलब्धी सरकार को सुनिश्चित करनी होगी तभी किसानों की स्थिति सुधरेगी और उन्हें आत्महत्या करने से रोका जा सकेगा।